(पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण महाराज, वृन्दावन धाम)
मथुरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पश्चिम में स्थित है वृन्दावन धाम। भारत वर्ष में अनेक तीर्थ स्थल जैसे अयोध्या, द्वारिका, चित्रकूट, चार धाम आदि अवस्थित हैं। इन्हीं सब धामों में ब्रज मण्डल अपना अनूठा महत्व रखता है। भक्ति रस में ब्रज रस की माधुरी अनुपमेय है। भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रज में प्रकट होकर रस की जो मधुरतम धारा प्रवाहित की उसकी समस्त विश्व में कोई तुलना नहीं है। बड़े-बड़े ज्ञानी, योगी, ऋषि मुनि हजारों वर्ष प्रभु के दर्शन पाने को तप करते हैं फिर भी वो प्रभु का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाते हैं वही इस ब्रज की पावन भूमि में परम सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण सहज ही सुलभ हो जाते हैं। ब्रज मण्डल का भी हृदय है श्रीवृन्दावन धाम। जो भगवान् श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय स्थान है क्योंकि जहाँ वह अपनी प्राणेश्वरी श्रीराधा के साथ निरंतर विहार परायण रहते हैं।

इसी वृन्दावन धाम में विराजमान विश्वप्रसिद्ध रसिक संत परम पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज जो श्रीश्यामा-श्याम के उपासक हैं व अनंत श्री विभूषित,वंशी अवतार, परात्पर प्रेम स्वरूप श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी द्वारा प्रकट किए गए “सहचरी भाव” या “सखी भाव” के प्रतीक हैं।
वर्तमान समय में सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शन अत्यंत दुर्लभ हो गया है। हालाँकि इन दिनों और इस युग में भी पूज्य महाराज जी लगातार प्रमुख शास्त्रीय सिद्धांतों को बिल्कुल सरल बनाकर लोगों के सामने अपने सत्संग के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे प्रत्येक व्यक्ति को उस विशुद्ध प्रेम लक्षणा भक्ति का स्वाद मिल सके। वह उन कुछ रसिक संतों में से एक हैं, जो अत्यंत गोपनीय और परम पवित्र वृंदावन निभृत निकुंज उपासना के माध्यम से ‘नित्य विहार रस’ प्रदान कर रहे हैं, जिसे प्रेम स्वरूप, श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी ने प्रकटकर अपने शरणागत जनों को वितरित किया था।

प्रेम रसावतार श्री हित हरिवंश चंद्र महाप्रभु भारत वर्ष के धर्माचार्यों की चिर प्राचीन परम्परा की एक अनुपम विभूति हैं। उन्होंने श्री राधाकृष्ण भक्ति के क्षेत्र में एक सर्वथा नवीन रस सिद्धान्त एवं उनकी उपासना प्रणाली का प्रवर्तन किया। उन्हें श्री श्यामसुंदर की वंशी का अवतार माना जाता है। उनकी वाणी रचनाओं में वेणुनाद जैसी मधुरता एवं मोहकता है।
पूज्य महाराज जी हमेशा प्रिया-प्रियतम के प्रति पूर्ण समर्पण करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।वे कहते हैं, “यह बिना शर्त समर्पण हमें शाश्वत आनंद या भगवत्प्रेम प्राप्त करने में मदद करेगा जो कि बड़ी से बड़ी कठोर आध्यात्मिक साधना द्वारा भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि कठोर साधना के बाद भी साधक अपनी वृत्तियों पर पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं कर पाता है तथा देहभाव अर्थात् मिथ्या अहंकार से रहित नहीं हो पाता है और यह देहाभिमान प्रिया-प्रियतम का शुद्ध प्रेम प्राप्त करने में बड़ा ही बाधक है”।

आज महाराज जी के देश-विदेश में करोड़ों भक्त हैं,जो यूट्यूब पर उनका दैनिक सत्संग सुनते हैं व उनके बताये हुए मार्ग पर चलने की प्रयास कर रहे हैं। बहुत दूर-दूर से आम व विशिष्ट लोग उनसे एकांतिक वार्तालाप के माध्यम से अपने प्रश्नों का समाधान कराने के लिए आते हैं।
भारतवर्ष अपनी आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है। जनसाधारण को अध्यात्म की ओर प्रेरित करने हेतु भारत में समय-समय पर संत-महापुरुष प्रकट होते रहते हैं। जो अपने आचरणों और उपदेशों से मानव जीवन के मूल्यों का बोध कराते हैं। वैदिक ऋषियों से लेकर आज तक बहुत से महात्मा हुए हैं जिन्होंने भारत की आध्यात्मिक चेतना को जागरित बनाएरखा है। इस संत परम्परा में श्रीकबीरदास, श्रीरैदासजी, श्रीतुलसीदासजी, श्रीसूरदासजी, मीराबाई जी जैसे अनेकों भक्त हुए और वर्तमान में श्री प्रेमानन्द जी महाराज, जो अपने त्याग-वैराग्य, तप और भक्तिमय जीवन से हम सभी को आलोकित कर रहे हैं।
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज हमेशा कहते हैं कि मानव में प्रेम-सुख की स्वाभाविक कामना है, हमें जरूरत है उस प्रेम को सही मायने में समझने की। उसे पूर्ण करने के लिए ही वही परात्पर अव्यक्त रसब्रह्म श्रीराधा-माधव के रूप में व्यक्त हुआ है।
धन-धन वृन्दावन रजधानी।
जहाँ विराजत मोहन राजा श्री राधा महारानी।
सदा सनातन एक रस जोरी महिमा निगम ना जानी।
श्री हरिप्रिया हितु निज दासी रहत सदा अगवानी॥
श्रीधाम वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी, योगी, यती भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी की बुद्धि भी यहाँ के प्रेम के आगे विस्मित हो जाती है। वृन्दावन रमिकों की राजधानी है यहाँ के राजा श्रीश्यामसुन्दर और महारानी श्रीराधिका जी है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। वृन्दावन श्यामसुन्दर की प्रियतमा श्री राधिका जी का निज धाम है जो कि सभी धामों से ऊपर है और ब्रज धाम का भी मुकुटमणि है।

महाराज जी कहते हैं कि प्रेम प्राप्ति का सबसे सरल उपाय हैब्रज-वृन्दावन की रज (पवित्र धूलि) की शरण लेना। वृन्दावन कोई साधारण स्थान या सिर्फ एक धार्मिक स्थान नहीं बल्कि साक्षात् श्रीश्यामा-श्याम का निज महल अर्थात् निज निवास स्थान सच्चिदानन्दमय धाम है, जहाँ प्रिया-प्रियतम की दिव्य लीलाएँ आज भी हो रही हैं। वृन्दावन धाम हमें सभी पापों से मुक्त करने और प्रिया लाल के अनुपम रस की वर्षा कर उसमें डुबोने में पूर्ण रूप से सक्षम है। यदि हम वृन्दावन धाम की शरण लेते हैं और अपने गुरुदेव के निर्देश के अनुसार अपना जीवन जीते हैं तो हम निस्संदेह अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति कर लेंगे। जिन लोगों को पूज्य महाराज जी के सत्संग को सुनने और उनकी संगति में लाभ उठाने का सुनहरा अवसर मिल रहा है, वे वास्तव में श्रीश्यामा-श्याम के कृपापात्र हैं। ये भाग्यशाली आत्माएं जल्द ही खुद को प्रेम रस में सराबोर पाएंगी।
व्रज समुद्र मथुरा कमल, वृन्दावन मकरंद।
व्रजबनिता सब पुष्प हैं, मधुकर गोकुलचंद॥
निखिल विश्व की आत्मा श्री कृष्ण चराचर प्रकृति के एक मात्र अधीश्वर हैं, समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी हैं। वही सर्वव्यापक हैं, अन्तर्यामी हैं। सच्चिदानन्द श्री कृष्ण का निज धाम, उनकी बाल लीलाओं का साक्षी एवं उनकी प्रियतमा श्री राधारानी का हृदय है ब्रज धाम।
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